Description
हिन्दी भाषा के महान उपन्यासकार आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा रचित उपन्यास गोली उनकी सर्वश्रेष्ठ रचनाओं में से एक है। 1958 में पहली बार प्रकाशित आचार्य चतुरसेन का यह अत्यंत लोकप्रिय उपन्यास राजस्थान के रजवाड़ों में प्रचलित गोली प्रथा पर आधारित है। चंपा नामक गोली का पूरा जीवन राजा को वासना को पूरा करने में निकल जाता है और वह मन-ही-मन अपने पति के प्रेम-पार्श्व को तरसती रहती है। यही इस उपन्यास का सार है। इस उपन्यास में शास्त्री जी ने राजस्थान के राजा-महाराजाओं और उनके महलों के अंदरूनी जीवन को बड़े ही रोचक, मार्मिक तथा मनोरंजन के साथ पेश किया है। उन्होंने ‘गोली’ उपन्यास के माध्यम से दासियों के संबंधों को उकेरते हुए समकालीन समाज को रेखांकित किया है। इसी कारण ‘गोली’ को हमेशा एक प्रामाणिक दस्तावेज माना जाएगा। शास्त्रीजी ने ‘गोली’ उपन्यास में अपनी समर्थ भाषा शैली की वजह से अद्भुत लोकप्रियता हासिल की तथा वे जन साहित्यकार बने। लेखक का कहना है, “मेरी इस चंपा को और उसके श्रृंगार के देवता किसुन को आप कभी भूलेंगे नहीं। चंपा के दर्द की एक-एक टीस आप एक बहुमूल्य रत्न की भाँति अपने हृदय में संजोकर रखेंगे।”





Reviews
There are no reviews yet.