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Description

ओम प्रकाश शर्मा का यह उपन्यास “एक अपराध, कितने अपराधी” अपने शीर्षक की ही तरह पाठक के दिमाग में तुरंत सवाल खड़ा कर देता है —
क्या हर अपराध का सिर्फ़ एक ही अपराधी होता है? या कभी-कभी पूरा समाज उसका भागीदार बन जाता है?

“एक अपराध, कितने अपराधी” सिर्फ़ एक जासूसी उपन्यास नहीं — यह समाज, रिश्तों और न्याय की गहराइयों को टटोलने वाला आईना है।
एक ऐसा आईना जिसमें हर चेहरा साफ़ है, लेकिन फिर भी धुंधला लगता है।