Description
कितना बड़ा झूठ
जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा की चर्चित जगन–बन्दूक सिंह सीरीज़ का एक रोमांचक जासूसी उपन्यास है, जो पहली बार 1980 के दशक में प्रकाशित हुआ था। लखनऊ में एक बीमार और फटेहाल व्यक्ति रामआसरे अचानक गृह मंत्री के दरवाज़े पर पहुँचता है। वह कुछ बेहद महत्वपूर्ण बताना चाहता है, लेकिन अपनी बात पूरी करने से पहले ही उसकी मौत हो जाती है। उसकी जेब से मिली डायरी उसकी ज़िंदगी और उसकी बेटी वीणा की रहस्यमय मौत से जुड़े कई सवाल खड़े कर देती है। क्या वीणा ने आत्महत्या की थी, या उसकी मौत के पीछे कोई गहरा षड्यंत्र था? मामला जब केंद्रीय खुफिया विभाग के तेज-तर्रार जासूस जगन और उसके अनोखे साथी बन्दूक सिंह तक पहुँचता है, तो जांच का रास्ता लखनऊ से कानपुर, इलाहाबाद और रीवा तक फैल जाता है। सरकारी ठेकों में घपले, रहस्यमय इंजीनियर राकेश चन्द्र, संदिग्ध रिश्ते, झूठी कहानियाँ और एक के बाद एक खतरनाक हमले हर सुराग एक नए सवाल को जन्म देता है। जगन और बन्दूक सिंह को जल्द ही एहसास हो जाता है कि इस मामले में सच और झूठ के बीच की दूरी बहुत छोटी है।
जो व्यक्ति सबसे मासूम दिखाई देता है, वही सबसे बड़ा राज़ छिपाए हो सकता है। और जब जांच हत्या की साजिश, अपराधियों और एक रहस्यमयी महिला मीता तक पहुँचती है, तब कहानी का असली चेहरा सामने आने लगता है। आखिर रामआसरे गृह मंत्री के पास क्या बताने आया था? वीणा की मौत का सच क्या था? राकेश चन्द्र की असली भूमिका क्या थी? और इस पूरे खेल में
कितना बड़ा था वह झूठ? रहस्य, रोमांच, हास्य और जासूसी की तेज़ रफ्तार से भरी यह कहानी पाठक को आखिरी पन्ने तक बाँधे रखती है।



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