KAB TAK PUAKROO | कब तक पुकारूं | (संपूर्ण संस्करण)

KAB TAK PUAKROO | कब तक पुकारूं | (संपूर्ण संस्करण)

Rs. 550.00
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KAB TAK PUAKROO | कब तक पुकारूं | (संपूर्ण संस्करण)

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कब तक पुकारूं प्रसिद्ध हिंदी लेखक रांगेय राघव द्वारा रचित एक आर्थत संवेदनशील और यथार्थवादी उपन्यास है। यह उपन्यास समाज के उस तबके की पीड़ा, उपेक्षा और संघर्ष को दर्शाता है जिसे अक्सर मुख्यधारा की कथाओं में नजरअंदाज कर दिया जाता है- यानी दलित और वंचित वर्ग। यह उपन्यास नामक निन्दा की जीवन-यात्रा के माध्यम से उस सामाजिक अन्याय और शोषण को उजागर करता है जो भारतीय समाज की जड़ों में गहराई तक फैला हुआ है। जिन्दा एक दलित युवक है, जो समाज में अपने अस्तित्व, आत्मसम्मान और अधिकारों के लिए संघर्ष करता है। उसके जीवन में गरीबी, अपमान, भेदभाव और अमानवीयता के अनेक अनुभव है, लेकिन फिर भी वह हार नहीं मानता। कब तक पुकारूं एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि यह उन करोड़ों लोगों की आवाज है जो सदियों से ज्यातिवाद, छुआछूत और अन्याय के शिकार हैं। रांगेय राघव ने इसमें दलित चेतना, सामाजिक विषमता और व्यवस्था की विफलता को गहरे और मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है। इस उपन्यास की भाषा सहन, सशक्त और भावनात्मक है। इसमें कहीं-कहीं क्रांति की पुकार है, तो कहीं करुणा और पीड़ा की गूंज। यह कृति केयल साहित्य नहीं, बल्कि एक सामाजिक दस्तावेज है, जो हमे आत्मचिंतन के लिए विवश करती है। कब तक पुकारूं आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना अपने समय में था। यह उपन्यास पढ़ने के बाद पाठक सिर्फ जिन्दा को नहीं, बल्कि पूरे समाज को समझने की कोशिश करता है और यह इसकी सबसे बड़ी सफलता है

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