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भटके हुए” एक गहरी सामाजिक और मनोवैज्ञानिक झलक देता है उन युवाओं की दुनिया में, जो अपने लक्ष्य, अपने आत्मसम्मान, और अपने अस्तित्व की तलाश में भटकते चले जाते हैं।

“भटके हुए” न तो केवल एक उपन्यास है, न ही सिर्फ़ एक कहानी—
यह एक आईना है उस समाज का, जो भटके हुए लोगों को रास्ता नहीं दिखाता, बस उन्हें दोष देता है।