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Description

पाप की परछाईं एक गहराई से बुनी गई सामाजिक अपराध कथा है जिसमें ओमप्रकाश शर्मा जी ने यह दिखाने का प्रयास किया है कि किसी व्यक्ति का अतीत, चाहे वह कितना भी छिपाया जाए, उसकी परछाईं बनकर वर्तमान और भविष्य का पीछा करता है। उपन्यास में यह प्रश्न बार-बार उभरता है: क्या इंसान अपने पुराने पापों से बच सकता है? या वे पाप परछाईं बनकर जीवनभर पीछा करते रहते हैं?